विष्णु सहस्रनाम
śuklāmbaradharaṃ viṣṇuṃ śaśivarṇaṃ caturbhujam | prasannavadanaṃ dhyāyet sarvavighnopaśāntaye || yasya smaraṇamātreṇa janmasaṃsārabandhanāt | vimucyate namastasmai viṣṇave prabhaviṣṇave || oṃ viśvaṃ viṣṇurvaṣaṭkāro bhūtabhavyabhavatprabhuḥ | bhūtakṛdbhūtabhṛdbhāvo bhūtātmā bhūtabhāvanaḥ ||1|| pūtātmā paramātmā ca muktānāṃ paramā gatiḥ | avyayaḥ puruṣaḥ sākṣī kṣetrajño'kṣara eva ca ||2|| yogo yogavidāṃ netā pradhānapuruṣeśvaraḥ | nārasiṃhavapuḥ śrīmān keśavaḥ puruṣottamaḥ ||3|| sarvaḥ śarvaḥ śivaḥ sthāṇurbhūtādirnirdhiravyayaḥ | sambhavo bhāvano bhartā prabhavaḥ prabhurīśvaraḥ ||4|| svayambhūḥ śambhurādityaḥ puṣkarākṣo mahāsvanaḥ | anādinidhano dhātā vidhātā dhāturuttamaḥ ||5|| itīdaṃ kīrtanīyasya keśavasya mahātmanaḥ | nāmnāṃ sahasraṃ divyānāmaśeṣeṇa prakīrtitam || ya idaṃ śṛṇuyānnityaṃ yaścāpi parikīrtayet | nāśubhaṃ prāpnuyāt kiñcit so'mutreha ca mānavaḥ ||
श्वेत वस्त्र धारण करने वाले, सर्वव्यापक, चन्द्रमा के समान उज्ज्वल वर्ण वाले, चार भुजाओं वाले, प्रसन्न मुखमण्डल वाले भगवान (विष्णु/गणेश) का ध्यान सब विघ्नों की शान्ति के लिए करना चाहिए। जिनके केवल स्मरण मात्र से जन्म-मृत्यु के संसार बन्धन से मुक्ति मिल जाती है, उन सर्वसमर्थ विष्णु भगवान को नमस्कार है। ॐ — (1) विश्व — जो सम्पूर्ण विश्व स्वरूप हैं, (2) विष्णु — जो सर्वव्यापक हैं, (3) वषट्कार — जिनके लिए यज्ञ में वषट् कहा जाता है, (4) भूतभव्यभवत्प्रभु — भूत, भविष्य और वर्तमान के स्वामी, (5) भूतकृत् — प्राणियों के रचयिता, (6) भूतभृत् — प्राणियों का पालन करने वाले, (7) भाव — शुद्ध सत्ता स्वरूप, (8) भूतात्मा — समस्त प्राणियों की आत्मा, (9) भूतभावन — प्राणियों को उत्पन्न करने वाले। (10) पूतात्मा — पवित्र आत्मा वाले, (11) परमात्मा — सर्वोच्च आत्मा, (12) मुक्तानां परमा गतिः — मुक्त आत्माओं की परम गति, (13) अव्यय — अविनाशी, (14) पुरुष — पुर (शरीर) में निवास करने वाले, (15) साक्षी — सबके साक्षी, (16) क्षेत्रज्ञ — क्षेत्र (शरीर) को जानने वाले, (17) अक्षर — अविनाशी, जिनका कभी क्षय नहीं होता। (18) योग — जो योग स्वरूप हैं, (19) योगविदां नेता — योगियों के नेता, (20) प्रधानपुरुषेश्वर — प्रकृति और पुरुष के ईश्वर, (21) नारसिंहवपु — नृसिंह (नर-सिंह) शरीर वाले, (22) श्रीमान् — लक्ष्मीपति, (23) केशव — ब्रह्मा और शिव के भी ईश्वर अथवा सुन्दर केशों वाले, (24) पुरुषोत्तम — पुरुषों में उत्तम, सर्वश्रेष्ठ। (25) सर्व — सर्वस्वरूप, (26) शर्व — संहारकर्ता, (27) शिव — मंगलकारी, (28) स्थाणु — स्थिर, अचल, (29) भूतादि — समस्त भूतों (प्राणियों) के आदि कारण, (30) निधि — जिनमें सब कुछ निहित है, (31) अव्यय — अविनाशी, (32) सम्भव — स्वेच्छा से प्रकट होने वाले, (33) भावन — सबको सत्ता प्रदान करने वाले, (34) भर्ता — सबका भरण-पोषण करने वाले, (35) प्रभव — सबकी उत्पत्ति के कारण, (36) प्रभु — सर्वसमर्थ स्वामी, (37) ईश्वर — परम नियन्ता। (38) स्वयम्भू — स्वयं प्रकट होने वाले, (39) शम्भु — सुख प्रदान करने वाले, (40) आदित्य — अदिति के पुत्र (वामन अवतार), (41) पुष्कराक्ष — कमल के समान नेत्रों वाले, (42) महास्वन — जिनकी ध्वनि महान है (प्रणव/ॐ), (43) अनादिनिधन — जिनका न आदि है न अन्त, (44) धाता — सबको धारण करने वाले, (45) विधाता — विधि (भाग्य) के रचयिता, (46) धातुरुत्तम — सबसे श्रेष्ठ धातु (तत्त्व)। इस प्रकार कीर्तन करने योग्य महात्मा केशव के दिव्य सहस्र (एक हजार) नामों का सम्पूर्ण रूप से कीर्तन किया गया। (यह फल श्रुति का आरम्भ है।) जो मनुष्य प्रतिदिन इसे सुनता है या इसका कीर्तन करता है, उसे इस लोक में और परलोक में कभी भी कोई अशुभ (अमंगल) प्राप्त नहीं होता।
śuklāmbaradharaṃ viṣṇuṃ śaśivarṇaṃ caturbhujam | prasannavadanaṃ dhyāyet sarvavighnopaśāntaye ||
श्वेत वस्त्र धारण करने वाले, सर्वव्यापक, चन्द्रमा के समान उज्ज्वल वर्ण वाले, चार भुजाओं वाले, प्रसन्न मुखमण्डल वाले भगवान (विष्णु/गणेश) का ध्यान सब विघ्नों की शान्ति के लिए करना चाहिए।
शब्दार्थ
yasya smaraṇamātreṇa janmasaṃsārabandhanāt | vimucyate namastasmai viṣṇave prabhaviṣṇave ||
जिनके केवल स्मरण मात्र से जन्म-मृत्यु के संसार बन्धन से मुक्ति मिल जाती है, उन सर्वसमर्थ विष्णु भगवान को नमस्कार है।
शब्दार्थ
oṃ viśvaṃ viṣṇurvaṣaṭkāro bhūtabhavyabhavatprabhuḥ | bhūtakṛdbhūtabhṛdbhāvo bhūtātmā bhūtabhāvanaḥ ||1||
ॐ — (1) विश्व — जो सम्पूर्ण विश्व स्वरूप हैं, (2) विष्णु — जो सर्वव्यापक हैं, (3) वषट्कार — जिनके लिए यज्ञ में वषट् कहा जाता है, (4) भूतभव्यभवत्प्रभु — भूत, भविष्य और वर्तमान के स्वामी, (5) भूतकृत् — प्राणियों के रचयिता, (6) भूतभृत् — प्राणियों का पालन करने वाले, (7) भाव — शुद्ध सत्ता स्वरूप, (8) भूतात्मा — समस्त प्राणियों की आत्मा, (9) भूतभावन — प्राणियों को उत्पन्न करने वाले।
शब्दार्थ
pūtātmā paramātmā ca muktānāṃ paramā gatiḥ | avyayaḥ puruṣaḥ sākṣī kṣetrajño'kṣara eva ca ||2||
(10) पूतात्मा — पवित्र आत्मा वाले, (11) परमात्मा — सर्वोच्च आत्मा, (12) मुक्तानां परमा गतिः — मुक्त आत्माओं की परम गति, (13) अव्यय — अविनाशी, (14) पुरुष — पुर (शरीर) में निवास करने वाले, (15) साक्षी — सबके साक्षी, (16) क्षेत्रज्ञ — क्षेत्र (शरीर) को जानने वाले, (17) अक्षर — अविनाशी, जिनका कभी क्षय नहीं होता।
शब्दार्थ
yogo yogavidāṃ netā pradhānapuruṣeśvaraḥ | nārasiṃhavapuḥ śrīmān keśavaḥ puruṣottamaḥ ||3||
(18) योग — जो योग स्वरूप हैं, (19) योगविदां नेता — योगियों के नेता, (20) प्रधानपुरुषेश्वर — प्रकृति और पुरुष के ईश्वर, (21) नारसिंहवपु — नृसिंह (नर-सिंह) शरीर वाले, (22) श्रीमान् — लक्ष्मीपति, (23) केशव — ब्रह्मा और शिव के भी ईश्वर अथवा सुन्दर केशों वाले, (24) पुरुषोत्तम — पुरुषों में उत्तम, सर्वश्रेष्ठ।
शब्दार्थ
sarvaḥ śarvaḥ śivaḥ sthāṇurbhūtādirnirdhiravyayaḥ | sambhavo bhāvano bhartā prabhavaḥ prabhurīśvaraḥ ||4||
(25) सर्व — सर्वस्वरूप, (26) शर्व — संहारकर्ता, (27) शिव — मंगलकारी, (28) स्थाणु — स्थिर, अचल, (29) भूतादि — समस्त भूतों (प्राणियों) के आदि कारण, (30) निधि — जिनमें सब कुछ निहित है, (31) अव्यय — अविनाशी, (32) सम्भव — स्वेच्छा से प्रकट होने वाले, (33) भावन — सबको सत्ता प्रदान करने वाले, (34) भर्ता — सबका भरण-पोषण करने वाले, (35) प्रभव — सबकी उत्पत्ति के कारण, (36) प्रभु — सर्वसमर्थ स्वामी, (37) ईश्वर — परम नियन्ता।
शब्दार्थ
svayambhūḥ śambhurādityaḥ puṣkarākṣo mahāsvanaḥ | anādinidhano dhātā vidhātā dhāturuttamaḥ ||5||
(38) स्वयम्भू — स्वयं प्रकट होने वाले, (39) शम्भु — सुख प्रदान करने वाले, (40) आदित्य — अदिति के पुत्र (वामन अवतार), (41) पुष्कराक्ष — कमल के समान नेत्रों वाले, (42) महास्वन — जिनकी ध्वनि महान है (प्रणव/ॐ), (43) अनादिनिधन — जिनका न आदि है न अन्त, (44) धाता — सबको धारण करने वाले, (45) विधाता — विधि (भाग्य) के रचयिता, (46) धातुरुत्तम — सबसे श्रेष्ठ धातु (तत्त्व)।
शब्दार्थ
itīdaṃ kīrtanīyasya keśavasya mahātmanaḥ | nāmnāṃ sahasraṃ divyānāmaśeṣeṇa prakīrtitam ||
इस प्रकार कीर्तन करने योग्य महात्मा केशव के दिव्य सहस्र (एक हजार) नामों का सम्पूर्ण रूप से कीर्तन किया गया। (यह फल श्रुति का आरम्भ है।)
शब्दार्थ
ya idaṃ śṛṇuyānnityaṃ yaścāpi parikīrtayet | nāśubhaṃ prāpnuyāt kiñcit so'mutreha ca mānavaḥ ||
जो मनुष्य प्रतिदिन इसे सुनता है या इसका कीर्तन करता है, उसे इस लोक में और परलोक में कभी भी कोई अशुभ (अमंगल) प्राप्त नहीं होता।
शब्दार्थ
परिचय
विष्णु सहस्रनाम स्तोत्रम् भगवान विष्णु के एक हजार दिव्य नामों का संग्रह है। यह महाभारत के अनुशासन पर्व में वर्णित है। कुरुक्षेत्र के युद्ध के पश्चात् जब भीष्म पितामह बाणों की शय्या पर लेटे थे, तब युधिष्ठिर ने उनसे पूछा कि सर्वश्रेष्ठ धर्म क्या है और किसकी स्तुति करने से मनुष्य को मोक्ष प्राप्त होता है। तब भीष्म ने भगवान विष्णु के सहस्र नामों का यह स्तोत्र सुनाया।
यह हिन्दू धर्म के सबसे पवित्र और लोकप्रिय स्तोत्रों में से एक है। आदि शंकराचार्य, पराशर भट्ट और अन्य महान आचार्यों ने इस पर भाष्य लिखे हैं।
महत्व
विष्णु सहस्रनाम का पाठ सभी पापों का नाश करता है, मनोकामनाओं की पूर्ति करता है और अन्ततः मोक्ष प्रदान करता है। फल श्रुति में कहा गया है कि जो व्यक्ति प्रतिदिन इन सहस्र नामों का श्रद्धापूर्वक पाठ करता है, उसे इस लोक में सुख और परलोक में मोक्ष प्राप्त होता है। प्रत्येक नाम भगवान विष्णु के किसी दिव्य गुण, लीला या स्वरूप का वर्णन करता है।
पाठ विधि
- प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात् इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।
- पाठ से पूर्व ध्यान श्लोकों का पाठ अवश्य करें।
- एकादशी के दिन पाठ करना विशेष फलदायी होता है।
- तुलसी माला पर “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करते हुए पाठ प्रारम्भ करें।
- पाठ के अन्त में फलश्रुति अवश्य पढ़ें।