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सनातन पथ

ललिता सहस्रनाम

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प्रदर्शन
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत् तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्। पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं बिभ्रतीं सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत् परामम्बिकाम्॥ अरुणां करुणातरङ्गिताक्षीं धृतपाशाङ्कुशपुष्पबाणचापाम्। अणिमादिभिरावृतां मयूखैरहमित्येव विभावये भवानीम्॥ ॐ श्रीमाता श्रीमहाराज्ञी श्रीमत्सिंहासनेश्वरी। चिदग्निकुण्डसम्भूता देवकार्यसमुद्यता॥१॥ उद्यद्भानुसहस्राभा चतुर्बाहुसमन्विता। रागस्वरूपपाशाढ्या क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला॥२॥ मनोरूपेक्षुकोदण्डा पञ्चतन्मात्रसायका। निजारुणप्रभापूरमज्जद्ब्रह्माण्डमण्डला॥३॥ चम्पकाशोकपुन्नागसौगन्धिकलसत्कचा। कुरुविन्दमणिश्रेणीकनत्कोटीरमण्डिता॥४॥ अष्टमीचन्द्रविभ्राजदलिकस्थलशोभिता। मुखचन्द्रकलङ्काभमृगनाभिविशेषका॥५॥
Transliteration

sindūrāruṇavigrahāṃ trinayanāṃ māṇikyamaulisphurat tārānāyakaśekharāṃ smitamukhīmāpīnavakṣoruhām | pāṇibhyāmalipūrṇaratnacaṣakaṃ raktotpalaṃ bibhratīṃ saumyāṃ ratnaghaṭastharaktacaraṇāṃ dhyāyet parāmambikām || aruṇāṃ karuṇātaraṅgitākṣīṃ dhṛtapāśāṅkuśapuṣpabāṇacāpām | aṇimādibhirāvṛtāṃ mayūkhairahami tyeva vibhāvaye bhavānīm || oṃ śrīmātā śrīmahārājñī śrīmatsiṃhāsaneśvarī | cidagnikuṇḍasambhūtā devakāryasamudyatā ||1|| udyadbhānusahasrābhā caturbāhusamanvitā | rāgasvarūpapāśāḍhyā krodhākārāṅkuśojjvalā ||2|| manorūpekṣukodaṇḍā pañcatanmātrasāyakā | nijāruṇaprabhāpūramajjadbrahmāṇḍamaṇḍalā ||3|| campakāśokapunnāgasaugandhikalasatkacā | kuruvindamaṇiśreṇīkanatkoṭīramaṇḍitā ||4|| aṣṭamīcandravibhrājadalikasthalaśobhitā | mukhacandrakalaṅkābhamṛganābhiviśeṣakā ||5||

अनुवाद

सिन्दूर के समान अरुण (लाल) विग्रह वाली, तीन नेत्रों वाली, माणिक्य मुकुट पर चन्द्रमा को धारण करने वाली, मुस्कान से युक्त मुखवाली, पूर्ण उन्नत वक्षस्थल वाली, हाथों में मधु से भरा रत्न पात्र और लाल कमल धारण करने वाली, सौम्य (शान्त), रत्न जड़ित पादुकाओं पर रक्त वर्ण चरणों वाली — ऐसी परम अम्बिका (माँ) का ध्यान करना चाहिए। अरुण (लाल) वर्ण वाली, करुणा से तरंगित नेत्रों वाली, पाश, अंकुश, पुष्प बाण और धनुष धारण करने वाली, अणिमा आदि (अष्ट) सिद्धियों से घिरी हुई, प्रकाश किरणों से युक्त — ऐसी भवानी का मैं 'अहम्' (मैं ही वह हूँ) इस भाव से ध्यान करता हूँ। ॐ — (1) श्रीमाता — श्री (लक्ष्मी/सम्पदा) की माता, (2) श्रीमहाराज्ञी — श्रीमती महान राज्ञी (महारानी), (3) श्रीमत्सिंहासनेश्वरी — श्रीमान् सिंहासन की ईश्वरी (अधिष्ठात्री), (4) चिदग्निकुण्डसम्भूता — चित् (चेतना) की अग्नि के कुण्ड से उत्पन्न, (5) देवकार्यसमुद्यता — देवताओं के कार्य (भण्डासुर वध) के लिए उद्यत। (6) उद्यद्भानुसहस्राभा — उदय होते हज़ार सूर्यों के समान कान्तिवाली, (7) चतुर्बाहुसमन्विता — चार भुजाओं से युक्त, (8) रागस्वरूपपाशाढ्या — राग (अनुराग/प्रेम) स्वरूप पाश से सम्पन्न, (9) क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला — क्रोध के आकार वाले अंकुश से उज्ज्वल। (10) मनोरूपेक्षुकोदण्डा — मन के रूप वाला इक्षु (गन्ना) का धनुष धारण करने वाली, (11) पञ्चतन्मात्रसायका — पाँच तन्मात्राओं (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) के रूप वाले पाँच बाणों वाली, (12) निजारुणप्रभापूरमज्जद्ब्रह्माण्डमण्डला — अपनी अरुण (लाल) प्रभा की बाढ़ में जिसने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मण्डल को डुबो दिया है। (13) चम्पकाशोकपुन्नागसौगन्धिकलसत्कचा — चम्पक, अशोक, पुन्नाग और सौगन्धिक पुष्पों से सुशोभित केशराशि वाली, (14) कुरुविन्दमणिश्रेणीकनत्कोटीरमण्डिता — कुरुविन्द मणियों की श्रेणी से चमकते मुकुट से अलंकृत। (15) अष्टमीचन्द्रविभ्राजदलिकस्थलशोभिता — अष्टमी के चन्द्रमा के समान चमकते ललाट (भाल) से शोभायमान, (16) मुखचन्द्रकलङ्काभमृगनाभिविशेषका — मुख रूपी चन्द्रमा पर कलंक के समान शोभित कस्तूरी (मृगनाभि) के तिलक वाली।

परिचय

ललिता सहस्रनाम स्तोत्रम् आदि शक्ति देवी ललिता त्रिपुरसुन्दरी के एक हजार दिव्य नामों का संग्रह है। यह ब्रह्माण्ड पुराण के ललितोपाख्यान में वर्णित है। इस स्तोत्र में हयग्रीव (भगवान विष्णु का एक अवतार) ने ऋषि अगस्त्य को देवी के सहस्र नाम सुनाए।

कथा के अनुसार भण्डासुर नामक राक्षस ने तीनों लोकों को त्रस्त कर दिया था। तब देवी ललिता चिदग्निकुण्ड से प्रकट हुईं और भण्डासुर का वध कर सृष्टि की रक्षा की। यह स्तोत्र देवी के उस दिव्य स्वरूप, शक्तियों और लीलाओं का वर्णन करता है।

महत्व

ललिता सहस्रनाम शाक्त सम्प्रदाय का सर्वोच्च स्तोत्र माना जाता है। श्रीविद्या उपासना में इसका विशेष स्थान है। प्रत्येक नाम देवी की किसी शक्ति, गुण अथवा दिव्य लीला का वर्णन करता है। यह स्तोत्र कुण्डलिनी योग, श्रीचक्र और तन्त्र शास्त्र के गूढ़ रहस्यों को नामों के माध्यम से प्रकट करता है। इसके पाठ से भक्ति, ज्ञान, ऐश्वर्य और अन्ततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।

पाठ विधि

  • शुक्रवार को इस स्तोत्र का पाठ विशेष फलदायी होता है।
  • नवरात्रि के नौ दिनों में प्रतिदिन पाठ करना अत्यन्त शुभ है।
  • पाठ से पूर्व ध्यान श्लोकों का पाठ करें और देवी ललिता का ध्यान करें।
  • कुमकुम, लाल पुष्प और लाल वस्त्र से देवी की पूजा करके पाठ करें।
  • पाठ के समय मन में श्रीचक्र का ध्यान करना उत्तम माना जाता है।
  • पूर्णिमा के दिन पाठ करने से विशेष कृपा प्राप्त होती है।