गायत्री मंत्र
oṃ bhūrbhuvaḥ svaḥ tatsaviturvareṇyaṃ bhargo devasya dhīmahi dhiyo yo naḥ pracodayāt
ओम, भू, भुवः और स्वः तीन लोकों का प्रतीक है उस सविता (सूर्य) देव का वरणीय (श्रेष्ठ) तेज उस देव के तेज का हम ध्यान करते हैं जो हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित करे
oṃ bhūrbhuvaḥ svaḥ
ओम, भू, भुवः और स्वः तीन लोकों का प्रतीक है
शब्दार्थ
tatsaviturvareṇyaṃ
उस सविता (सूर्य) देव का वरणीय (श्रेष्ठ) तेज
शब्दार्थ
bhargo devasya dhīmahi
उस देव के तेज का हम ध्यान करते हैं
शब्दार्थ
dhiyo yo naḥ pracodayāt
जो हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित करे
शब्दार्थ
अर्थ
गायत्री मंत्र वेदों की माता कहा जाता है। यह ऋग्वेद के मंडल 3, सूक्त 62, मंत्र 10 में विश्वामित्र ऋषि द्वारा रचित है। यह मंत्र सविता देव (सूर्य) को समर्पित है और बुद्धि की प्रेरणा के लिए प्रार्थना करता है।
संपूर्ण अर्थ: “उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अपनी अन्तरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे।“
लाभ
- मानसिक शांति: नियमित जप से मन शांत और एकाग्र होता है
- बुद्धि का विकास: विद्यार्थियों के लिए विशेष लाभकारी
- आध्यात्मिक उन्नति: चेतना का विकास और आत्मज्ञान की ओर प्रगति
- नकारात्मकता से रक्षा: मंत्र की ऊर्जा नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करती है
- स्वास्थ्य लाभ: प्राणायाम के साथ जप करने से शारीरिक लाभ
उच्चारण विधि
- प्रातःकाल सूर्योदय के समय पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें
- आसन पर बैठकर रीढ़ सीधी रखें
- तीन बार गहरी श्वास लें
- मंत्र का उच्चारण धीरे-धीरे, स्पष्ट और शुद्ध करें
- न्यूनतम 108 बार जप करें (एक माला)
- जप के समय सूर्य देव का ध्यान करें